फिल्म रिव्यु: दोबारा- सी योर ईविल : हॉरर के नाम पर बनी थ्रिलर फिल्म जो कहीं-कहीं आपको चौंकाती जरूर है

‘दोबारा’ एक बेहतरीन विदेशी फिल्म की नकल है और शायद इसीलिए इसके कई दृश्य आपको प्रभावित करते हैं, निर्देशक- प्रवाल रमन, लीना टंडन लेखक- माइक फ्लैंगन (मूल फिल्म), जैफ होवार्ड (मूल फिल्म) प्रवाल रमन (डायलॉग्स, स्क्रीन प्ले, स्क्रिप्ट, स्टोरी एडॉप्शन) कलाकार- हुमा कुरैशी, साक़िब सलीम, रिया चक्रवर्ती, आदिल हुसैन, लिज़ा रे, मैडलिना बेलारियू इयॉन रेटिंग- 2/5 प्रवाल रमन की ‘दोबारा – सी योर ईविल’ 2003 में आई हॉलिवुड फिल्म ‘ऑक्युलस’ पर आधारित है. यह सुपरनैचुरल-साइकलॉजिकल-हॉरर फिल्म एक ऐसे परिवार की कहानी थी जहां उसका मुखिया एक बुरी आत्मा के असर में आकर अपनी पत्नी का क़त्ल कर देता है, लेकिन तुरंत ही उसे अपनी गलती का एहसास हो जाता है और इस बीच जिस रिवॉल्वर से कत्ल होता है वह उसके 11वर्षीय बेटे के हाथ में आ चुकी होती है, अपराधबोध में डूबा पिता अपने बेटे के हाथों में मौजूद इस रिवॉल्वर का ट्रिगर दबा देता है और खुद भी मर जाता है, पिता की हत्या के शक में बेटे को सुधारगृह में भेज दिया जाता है, कहानी का मुख्य किरदार यानी इस लड़के की बहन दस साल तक अपने भाई के बाहर आने का इंतजार करती है, ताकि उसकी मदद से साबित किया जा सके कि वह और उसके पिता दोनों ही बेकसूर थे, और इन हत्याओं के पीछे उस बुरी आत्मा का हाथ था जो एक आईने में कैद है, ‘दोबारा’ में नताशा बनीं हुमा कुरैशी ने इसी बहन का किरदार निभाया है, जबकि रियल लाइफ के उनके भाई साकिब सलीम ने कबीर बनकर फिल्म में भी हुमा के भाई का ही रोल अदा किया है, सुधारगृह जाने से पहले कबीर अपनी बहन से वादा करके जाता है कि एक दिन वे दोनों उस आईने को जरूर खत्म कर देंगे. पूरी कहानी का ताना-बाना भाई-बहिन की इसी कवायद के इर्द-गिर्द बुना गया है कि आईने को कैसे नष्ट किया जाए, चूंकि दृश्य एक विदेशी फिल्म की नक़ल हैं तो अपना काम ठीक-ठाक कर जाते हैं, लेकिन इनके साथ प्रवाल ने जो डायलॉग्स लिखे हैं, खीज पैदा करने के लिए काफी हैं, फिर चाहे वो हुमा के लिए हों या साकिब के लिए या फिर आदिल हुसैन और रिया चक्रवर्ती के लिए, कबीर के सुधारगृह से बाहर आने के बाद से ही नताशा इंटरवल तक बेवजह उसके ‘प्रॉमिस’ को उस अधिकतम सीमा तक याद दिलाती है, जिससे बाद कोई भी अपने बाल नोंच ले. यही नहीं भाई-बहन की झड़प के बीच संवादों में जबरदस्ती का ह्यूमर दिखाने के

फिल्म रिव्यु दोबारा - सी योर ईविल : हॉरर के नाम पर बनी थ्रिलर फिल्म जो कहीं-कहीं आपको चौंकाती जरूर है

फिल्म रिव्यु दोबारा – सी योर ईविल : हॉरर के नाम पर बनी थ्रिलर फिल्म जो कहीं-कहीं आपको चौंकाती जरूर है

चक्कर में प्रवाल न सिर्फ कहानी का खौफ़ खुद ही खत्म कर देते हैं बल्कि इसे उबाऊ भी बनाते हैं, फिल्म देखते समय यह भी बचकाना लगता है कि उस आत्मा को हमेशा के लिए खत्म करने पर तुली नताशा आईने का छोटे से छोटे प्रभाव दिखने पर ऐसे खुश होती है जैसे वह किसी चुड़ैल से लड़ने की नहीं बल्कि पिकनिक पर जाने की तैयारी कर रही हो, कहानी जरूरी दृश्यों पर वर्तमान के साथ बार-बार अपने भूतकाल में जाती रहती है, जिससे आप प्रभावित हों या न हों, आपका ध्यान जरूर भटक जाता है, हुमा के साथ यह समस्या है, ‘एक थी डायन’ की बेअसर डायन बनकर आपको बेवजह बोर करती रहती हैं, इस फिल्म में उन्होंने अपना काम ठीक-ठाक करने की कोशिश की है, लेकिन यहां भी निराशा की सुई फिर घूमकर प्रवाल पर ही टिक जाती है जो हुमा से बेहतर स्तर का काम निकलवाने में असफल रहे. ऐसा ही कुछ कबीर बने साकिब के साथ भी हुआ है, मूल फिल्म के गंभीर हीरो की जबरदस्ती नकल करवाने के चक्कर में उन्हें सुस्त कर दिया गया है, वैसे उस निर्देशक से इन दो किरदारों से बारे में क्या ही शिकायत करना जिसने आदिल हुसैन सरीखे आला अभिनेता से भी साधारण ही अभिनय करवाया हो, इंटरवल के बाद कहानी थोड़ी कसावट के साथ रफ्तार जरूर पकड़ती है, लेकिन पहले हाफ में मर चुके आपके उत्साह को फिर से जगाने में नाकामयाब रहती है, हालांकि इस दौरान फिल्म के कुछ दृश्य आपको प्रभावित करने के साथ दिमाग पर भी जोर डालने के लिए मजबूर कर सकते हैं, जैसे वह दृश्य जहां साकिब हुमा के साथ बातचीत करते हैं जबकि वे वहां होती ही नहीं हैं, और एक वह भी जब साकिब और हुमा घर के बाहर भी होते हैं और अंदर भी. दोनों तरफ खड़ी भाई-बहन की ये जोड़ियां एक दूसरे को देखते हुए भ्रमित होती हैं कि असली कौन हैं? अगर प्रवाल ‘दोबारा’ में ऐसे पांच-सात सीन और डाल देते तो शायद यह फिल्म कुछ प्रभावी हो सकती थी, ‘ऑक्युलस’ को अपने समय में एक जबर्दस्त हॉरर फिल्म माना गया था लेकिन दोबारा को हॉरर के बजाय थ्रिलर कहना ज्यादा ठीक रहेगा, एक ऐसा थ्रिलर जो भारतीय दर्शकों के मिजाज का कतई नहीं है,

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